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Mahaveer Vani Bhag - II

Mahaveer Vani Bhag - II
Views: 115 Brand: Diamond Pocket Books
Product Code: Hardbound - 578 pages
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पुस्तक के बारे में Mahavir Vani - Bhag Do - महावीर वाणी -भाग दो

प्रज्ञापुरुष ओशो द्वारा दिये गये ये प्रवचन केवल महावीर के अनुयायी जैन समाज के लिये ही उपयोगी नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति जो स्वयं के रुपांतरण में उत्सुक है, जो अपनी मूर्छा से बाहर निकलकर जागृत जीवन जीना चाहता है उसके लिये महावीर के सूत्रों पर ओशो के अमृत वचन अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकते हैं। ओशो स्मरण दिलाते हैं: महावीर की दृष्टि में मनुष्य का उत्तरदायित्व चरम है। दुख है तो तुम कारण हो, सुख है तो तुम कारण हो। बंधे हो तो तुमने बंधना चाहा है। मुक्त होना चाहो, मुक्त हो जाओगे। कोई मनुष्य को बांधता नहीं, कोई मनुष्य को मुक्त नही करता।

 

महावीर

जैसे पर्वतों में हिमालय है या शिखरों में गौरीशंकर, वैसे ही व्यक्तियों में महावीर हैं। बड़ी है चढ़ाई। जमीन पर खड़े होकर भी गौरीशंकर के हिमाच्छादित शिखर को देखा जा सकता है। लेकिन जिन्हें चढ़ाई करनी हो और शिखर पर पहुंच कर ही शिखर को देखना हो, उन्हें बड़ी तैयारी की जरूरत है। दूर से भी देख सकते हैं महावीर को, लेकिन देर से जो परिचय होता है वह वास्तविक परिचय नहीं है। महावीर में तो छलांग लगा कर ही वास्तविक परिचय पाया जा सकता है।

 

विषय सूची

प्रवचन 1 : समय और मृत्यु का अंतर्बोध (अप्रमाद-सूत्र : 1)

प्रवचन 2 : अलिप्तता और अनासक्ति का भावबोध (अप्रमाद-सूत्र : 2)

प्रवचन 3 : एक ही नियम : होश (प्रमाद-स्थान-सूत्र : 1)

प्रवचन 4 : सारा खेल कामवासना का (प्रमाद-स्थान-सूत्र : 2)

प्रवचन 5 : ये चार शत्रु (कषाय-सूत्र)

प्रवचन 6 : अकेले ही है भोगना (अशरण-सूत्र)

प्रवचन 7 : यह नि:श्रेयस का मार्ग है (पंडित-सूत्र)

प्रवचन 8 : आप ही हैं अपने परम मित्र (आत्म-सूत्र : 1)

प्रवचन 9 : साधना ‍का सूत्र : संयम (आत्म-सूत्र : 2)

प्रवचन 10 : विकास ‍की ओर गति है धर्म (लोकतत्व-सूत्र : 1)

प्रवचन 11 : आत्मा का लक्षण है ज्ञान (लोकतत्व-सूत्र : 2)

प्रवचन 12 : मुमुक्षा के चार बीज (लोकतत्व-सूत्र : 3)

प्रवचन 13 : पांच ज्ञान और आठ कर्म (लोकतत्व-सूत्र : 4)

प्रवचन 14 : छह लेश्याएं : चेतना में उठी लहरें (लोकतत्व-सूत्र : 5)

प्रवचन 15 : पांच समितियां और तीन गुप्तियां (लोकतत्व-सूत्र : 6)

प्रवचन 16 : कौन है पूज्य? (पूज्य-सूत्र)

प्रवचन 17 : राग, द्वेष, भय से रहित है ब्राह्मण (ब्राह्मण-सूत्र : 1)

प्रवचन 18 : अलिप्तता है ब्राह्मणत्व (ब्राह्मण-सूत्र : 2)

प्रवचन 19 : वर्णभेद जन्म से नहीं, चर्या से (ब्राह्मण-सूत्र : 3)

प्रवचन 20 : भिक्षु की यात्रा अंतर्यात्रा है (भिक्षु-सूत्र : 1)

प्रवचन 21 : अ‍स्पर्शित, अकंप है भिक्षु (भिक्षु-सूत्र : 2)

प्रवचन 22 : भिक्षु कौन? (भिक्षु-सूत्र : 3)

प्रवचन 23 : कल्याण-पथ पर खड़ा है भिक्षु (भिक्षु-सूत्र : 4)

प्रवचन 24 : पहले ज्ञान, बाद में दया (मोक्षमार्ग-सूत्र : 1)

प्रवचन 25 : संयम है संतुलन की परम-अवस्था (मोक्षमार्ग-सूत्र : 2)

प्रवचन 26 : अंतस-बाह्य संबंधों से मुक्ति (मोक्षमार्ग-सूत्र : 3)

प्रवचन 27 : संन्यास प्रारंभ है, सिद्धि अंत (मोक्षमार्ग-सूत्र : 4)
 

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