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Main Kaun Hu

New Main Kaun Hu
Views: 37 Brand: Osho Media International
Product Code: HardBound: 226 pages
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क्या आपके भीतर प्रश्र्न है?
क्या आपके भीतर अपना प्रश्र्न है?
क्या जीवन आपके मन में प्रश्र्न नहीं उठाता?
क्या जीवन आपको जिज्ञासा से नहीं भरता?
क्या जीवन आपके सामने यह सवाल खड़ा नहीं करता है कि मैं कौन हूं? यह क्या है?
क्या आप एकदम बहरे और अंधे हैं? क्या आपके हृदय में कोई, कोई जिज्ञासा ही पैदा नहीं होती है?
अगर होती हो कोई जिज्ञासा, अगर होता हो कोई प्रश्र्न खड़ा, अगर होती हो कोई प्यास मन में जानने की, पहचानने की, जीवन के सत्य को पाने की, तो उसे इकट्ठा कर लें और उसे एक प्रश्र्न बन जाने दें। क्योंकि जो और चीजों के संबंध में पूछने जाता है वह दूर निकल गया, उसने बुनियादी प्रश्र्न छोड़ दिया। बुनियादी प्रश्र्न तो स्वयं से शुरू होता है--मैं कौन हूं?
- ओशो
 
Chapter Titles
#1: अज्ञान का बोध
#2: रहस्य का जन्म
#3: शून्यता का स्वीकार
#4: अकेले होने का साहस
#5: निष्पक्ष चित्त
#6: ध्यान में श्वास का सर्वाधिक महत
#7: श्वास: ध्यान का द्वार
#8: सौंदर्य का बोध
#9: सत्य शब्दों में प्रकट नहीं हो सक
#10: जीने की कला
#11: मैं विज्ञान की भाषा में बोल रहा हूं
 
मैं कौन हूं?
 
  • अकेले होने का साहस धर्म का संबंध परमात्मा से नहीं, धर्म का संबंध परलोक से नहीं, धर्म का संबंध मनुष्य के भीतर जो छिपा है--‘मैं जो हूं--उसे जान लेने से है। और यह मैं इसलिए कहना चाहूंगा कि जो यह भी नहीं जानता कि मैं कौन हूं, वह और क्या जान सकेगा? परमात्मा तो बहुत दूर, निकट तो मैं हूं। और निकट को भी जो नहीं जानता, वह दूर को कैसे जान सकेगा? जो स्वयं को नहीं जानता, उसका सब जानना झूठा और मिथ्या है। उसका सब ज्ञान अज्ञान सिद्ध होगा। क्योंकि उसने पहली ही जगह, प्राथमिक, निकटतम अज्ञान का जो घर था वहीं चोट नहीं की, उसने वहीं प्रहार नहीं किया।

    ‘मैं कौन हूं?’--इस सत्य की खोज से धर्म का संबंध है।

    और बड़े रहस्यों का रहस्य यह है कि जो इसको जान लेता है कि मैं कौन हूं, उसके लिए सब-कुछ जानने के द्वार खुल जाते हैं। और जो अपने भीतर ही ताले को खोल लेता है, उसके लिए इस जगत में फिर किसी रहस्य पर कोई ताला नहीं रह जाता। स्वयं को जान लेना सत्य को जान लेने की अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम स्वयं को बिना जाने यदि परमात्मा की प्रार्थनाओं में संलग्न हों, तो वे प्रार्थनाएं कोई फल नहीं लाएंगी। और हम स्वयं को जाने बिना यदि शास्त्रों को सिर पर ढो रहे हों, तो वे शास्त्र बोझ हो जाएंगे। उनसे कोई मुक्ति फलित नहीं होगी। स्वयं को जाने बिना हम जो भी करेंगे वह सब बंधन निर्मित करेगा, उससे कोई स्वतंत्रता आने को नहीं है।

    ‘मैं कौन हूं?’--इस रहस्य पर ही सारी खोज, सारा अन्वेषण है।

    लेकिन हम और सब करते हैं, इस एक बात की खोज में कभी भी संलग्न नहीं होते। कुछ लोग संसार को खोजते हैं--धन, यश, प्रतिष्ठा को खोजते हैं। फिर जब वे ऊब जाते हैं संसार से, धन और प्रतिष्ठा और यश की दौड़ में समझ लेते हैं कि कुछ भी नहीं है, तब वे एक नई दौड़ में संलग्न होते हैं--जिसे मोक्ष की दौड़ कहें, परमात्मा की दौड़ कहें। संसार के लिए दौड़ते थे, उससे ऊब कर और परेशान होकर फिर वे परमात्मा के लिए दौड़ने लगते हैं। लेकिन एक बात जो संसार की दौड़ में थी वही परमात्मा की दौड़ में भी कायम रहती है: न तो संसार की दौड़ में उन्होंने अपने को जानने की कभी कोई चेष्टा की थी और न परमात्मा की दौड़ में ही वे अपने को जानने की चेष्टा करते हैं। इसलिए सांसारिक भी अपने को जाने बिना रह जाते हैं और जिन तथाकथित धार्मिकों को हम जानते हैं वे भी स्वयं को नहीं जान पाते। दोनों दौड़ते हैं, कोई संसार के लिए, कोई मोक्ष के लिए, लेकिन स्वयं के लिए खोज से वंचित रह जाते हैं। सच यह है कि चाहे कोई संसार के लिए दौड़ रहा हो और चाहे परमात्मा के लिए, जब तक दौड़ रहा है तब तक स्वयं को नहीं जान सकेगा। स्वयं के जानने के लिए ठहर जाना जरूरी है, दौड़ना नहीं।

    किसी भी तरह की दौड़ में जो उलझा हुआ है, वह अपने को नहीं जान पाएगा। दौड़ने वाला चित्त कैसे अपने को जान सकेगा? दौड़ने वाला चित्त ही तो उलझन है। दौड़ने वाला चित्त ही तो अशांति है। दौड़ने वाला चित्त ही तो अंधकार है। दौड़ने वाले चित्त के कारण ही, दौड़ने वाले चित्त की लहरों के कारण ही तो वह हमसे अपरिचित रह जाता है जो भीतर छिपा है।

    दुनिया में दो तरह के दौड़ने वाले लोग हैं, एक को हम कहते हैं: सांसारिक लोग और एक को हम कहते हैं: आध्यात्मिक और धार्मिक लोग। मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा: चाहे दौड़ संसार की हो और चाहे धर्म की, दौड़ मात्र व्यक्ति को स्वयं से वंचित करती है और स्वयं को नहीं जानने देती। दौड़ बदल जाती है, धन का खोजी मोक्ष का खोजी बन जाता है, पद का खोजी परमात्मा को खोजने लगता है, दौड़ बदल जाती है, दिशा बदल जाती है, लेकिन दौड़ने वाला चित्त कायम रहता है, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। और यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है! क्यों? क्योंकि हम जानते हैं कि संसार की दौड़ बुरी है, इसलिए जब कोई संसार की दौड़ छोड़ कर धर्म की दौड़ में लगता है, तो हम कहते हैं, बहुत अच्छा किया।

    मैं आपसे कहना चाहता हूं: संसार की दौड़ बुरी नहीं होती, दौड़ बुरी होती है--दौड़। वह दौड़ चाहे मोक्ष की हो, तो भी बुरी होती है। वह दौड़ चाहे परमात्मा के लिए हो, तो भी बुरी होती है। क्योंकि दौड़ने वाला चित्त उद्विग्न होता है, अशांत होता है, बेचैन होता है। धर्म का संबंध अ-दौड़ की स्थिति से है, जो दौड़ छोड़ता है और ठहरता है। जो कुछ भी नहीं पाने के लिए पागल होता, जो रुक जाता है, ठहर जाता है, उस व्यक्ति के जीवन में धर्म का प्रारंभ होता है।
    - ओशो

    इस पुस्तक में ओशो निम्नलिखित विषयों पर बोले हैं:
    मौन, जिज्ञासा, निष्पक्षता, ध्यान, श्वास, जीने की कला, विज्ञान
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