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Gunge Keri Sarkara - गूंगे केरी सरकरा

-15% Gunge Keri Sarkara - गूंगे केरी सरकरा
Views: 344 Brand: Osho Media International
Product Code: Hardbound - 248 Pages
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कबीरः सत्संग का संगीत

अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाय।
गूंगे केरी सरकरा, खाइ और मुसकाय।।
एक-एक शब्द बहुमूल्य है। उपनिषद फीके पड़ जाते हैं कबीर के सामने। वेद दयनीय मालूम पड़ने लगता है। कबीर बहुत अनूठे हैं। बेपढ़े-लिखे हैं, लेकिन जीवन के अनुभव से उन्होंने कुछ सार पा लिया है। और चूंकि वे पंडित नहीं हैं, इसलिए सार की बात संक्षिप्त में कह दी है। उसमें विस्तार नहीं है। बीज की तरह उनके वचन हैं--बीज-मंत्र की भांति। ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:

जीवन का सूत्र है : असुरक्षा में जीना
प्रेम साधना का सार-तत्व है
अकेले होने का साहस
समाज निर्मित अंतकरण से मुक्ति
मनस्विद और मनोविश्लेषण
धर्म की सारी कला मृत्यु की कला है - जीते-जी मर जाना |

सामग्री तालिका
1: अकथ कहानी प्रेम की
2: लिखालिखी की है नहीं, देखादेखी बात
3: दुलहा दुलहिन मिल गए, फीकी पड़ी बरात
4: सम्यक् जीवन : सम्यक् मृत्यु
5: एक एक जिनि जानिया, तिन ही सच पाया
6: सतगुरु नूर तमाम
7: जिन जागा तिन मानिक पाइया
8: समर्पण है परम समाधान
9: मृत्यु है द्वार
10: संन्यास परम सुहाग है
 
उद्धरण : गूंगे केरी सरकरा - पहला प्रवचन - अकथ कहानी प्रेम की

मैं देखता हूं तुम्हें, और एक बात सुनिश्र्चित मालूम होती है कि कुछ तुम्हारे पास था और खो गया है--कोई संपदा, कोई सुराग, कोई राज, कोई रहस्य, कोई कुंजी, जो तुम्हारे पास थी और खो गई है।

तुम सदा कुछ खोज रहे हो; प्रतिपल, सोते-जागते खोज में लगे हो। शायद ठीक पता भी नहीं कि क्या खोजते हो, और यह भी पता नहीं कि क्या खोया है; लेकिन खोज तुम्हारी आंखों में है; तुम्हारे हृदय की धड़कन-धड़कन में है। और यह खोज जन्मों से चल रही है। कभी तुम उस खोज को सत्य की खोज कहते हो; लेकिन सत्य तो तुमने कभी जाना नहीं, उसे खो कैसे सकोगे? कभी तुम उसे परमात्मा की खोज कहते हो; लेकिन परमात्मा से भी तुम्हारा मिलन कभी हुआ नहीं, तो तुम बिछुड़ कैसे सकोगे? मंदिर में, मस्जिद में, काशी में, मक्का में, द्वार-द्वार तुम चोट करते फिरते हो, इस आशा में कि जो खो गया है वह मिल जाएगा। लेकिन जब तक ठीक-ठीक पक्का पता न हो कि क्या खोया है, कहां खोया है, तब तक खोज पूरी नहीं हो सकती। तुम्हारा अनुभव भी कहेगा--द्वार तो बहुत खटखटाए; लेकिन खाली हाथ ही तुम लौट आए हो। इसमें द्वारों का कोई कसूर नहीं है। खोज के पहले सुनिश्र्चित होना चाहिए--क्या मैं खोज रहा हूं? कहां खोया है? बीमारी का ठीक पता ही न हो तो तुम औषधि को कैसे खोजोगे? वैद्य भी मिल जाए तो क्या करेगा? ओशो
 
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