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गीता-दर्शन भाग आठ – Gita Darshan, Vol.8

गीता-दर्शन भाग आठ – Gita Darshan, Vol.8
Views: 1071 Brand: Osho Media International
Product Code: 580-pages Hard bound
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"मनुष्य-जाति के इतिहास में उस परम निगूढ़ तत्व के संबंध में जितने भी तर्क हो सकते हैं, सब अर्जुन ने उठाए। और शाश्वत में लीन हो गए व्यक्ति से जितने उत्तर आ सकते हैं, वे सभी कृष्ण ने दिए। इसलिए गीता अनूठी है। वह सार-संचय है; वह सारी मनुष्य की जिज्ञासा, खोज, उपलब्धि, सभी का नवनीत है। उसमें सारे खोजियों का सार अर्जुन है। और सारे खोज लेने वालों का सार कृष्ण हैं।"—ओशो

इस पुस्तक में गीता के सत्रहवें व अठारहवें अध्याय — ‘श्रद्धात्रय-विभाग-योग’ व ‘मोक्ष-संन्यास-योग’ — तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।
कुछ विषय बिंदु:

भोजन की कीमिया

तीन प्रकार के कर्म

सुख और शांति का भेद

समाधान का रहस्य

सामग्री तालिका

अनुक्रम

अध्याय 17
1: सत्य की खोज और त्रिगुण का गणित
2: भक्त और भगवान
3: सुख नहीं, शांति खोजो
4: संदेह और श्रद्धा प्रवचन
5: भोजन की कीमिया
6: तीन प्रकार के यज्ञ
7: शरीर वाणी और मन के तप
8: पूरब और पश्चिम का अभिनव संतुलन
9: दान-सात्विक, राजस, तामस
10: क्रांति की कीमिया: स्वीकार
11: मन का महाभारत
    
अध्याय 18
1: अंतिम जिज्ञासा: क्या है मोक्ष, क्या है संन्यास
2: सात्विक, राजस और तामस त्याग
3: फलाकांक्षा का त्याग
4: सदगुरु की खोज
5: महासूत्र साक्षी प्रवचन
6: गुणातीत जागरण
7: तीन प्रकार के कर्म
8: समाधान और समाधि
9: तीन प्रकार की बुद्धि
10: गुरु पहला स्वाद है
11: तामस, राजस और सात्विक सुख
12: गुणातीत है आनंद
13: स्वधर्म, स्वकर्म और वर्ण
14: पात्रता और प्रसाद
15: गीता-पाठ और कृष्ण-पूजा
16: संसार ही मोक्ष बन जाए
17: समर्पण का राज
18: आध्यात्मिक संप्रेषण की गोपनियता
19: मनन और निदिध्यासन
20: गीता-ज्ञान-यज्ञ
21: परमात्मा को झेलने की पात्रता

उद्धरण : गीता-दर्शन भाग आठ - सत्य की खोज और त्रिगुण का गणित
"अर्जुन खोजती हुई मनुष्यता का प्रतीक है। अर्जुन पूछ रहा है। और पूछना किसी दार्शनिक का पूछना नहीं है। पूछना ऐसा नहीं कि घर में बैठे विश्राम कर रहे हैं और गपशप कर रहे हैं। यह पूछना कोई कुतूहल नहीं है; जीवन दांव पर लगा है। युद्ध के मैदान में खड़ा है। युद्ध के मैदान में बहुत कम लोग पूछते हैं। इसलिए तो गीता अनूठी किताब है।

वेद हैं, उपनिषद हैं, बाइबिल है, कुरान है; बड़ी अनूठी किताबें हैं दुनिया में, लेकिन गीता बेजोड़ है। उपनिषद पैदा हुए ऋषिओं के एकांत कुटीरों में, उपवनों में, वनों में। जंगलों में ऋषिओं के पास बैठे हैं उनके शिष्य।…लेकिन गीता अनूठी है; युद्ध के मैदान में पैदा हुई है। किसी शिष्य ने किसी गुरु से नहीं पूछा है; किसी शिष्य ने गुरु की एकांत कुटी में बैठकर जिज्ञासा नहीं की है। युद्ध की सघन घड़ी में, जहां जीवन और मौत दांव पर लगे हैं, वहां अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है। यह दांव बड़ा महत्वपूर्ण है। और जब तक तुम्हारा भी जीवन दांव पर न लगा हो अर्जुन जैसा, तब तक तुम कृष्ण का उत्तर न पा सकोगे।

कृष्ण का उत्तर अर्जुन ही पा सकता है। इसलिए गीता बहुत लोग पढ़ते हैं, कृष्ण का उत्तर उन्हें मिलता नहीं। क्योंकि कृष्ण का उत्तर पाने के लिए अर्जुन की चेतना चाहिए।

इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे संन्यासी भाग जाएं पहाड़ों में। जीवन के युद्ध में ही खड़े रहें, जहां सब दांव पर लगा है; भगोड़ापन न दिखाएं, पलायन न करें; जीवन से पीठ न मोड़ें; आमने-सामने खड़े रहें। और उस जीवन के संघर्ष में ही उठने दें जिज्ञासा को।…और युद्ध है। तुम जहां भी हो--बाजार में, दुकान में, दफ्तर में, घर में--युद्ध है। प्रतिपल युद्ध चल रहा है, अपनों से ही चल रहा है। इसलिए कथा बड़ी मधुर है कि उस तरफ भी, अर्जुन के विरोध में जो खड़े हैं, वे ही अपने ही लोग हैं, भाई हैं, चचेरे भाई हैं, मित्र हैं, सहपाठी हैं, संबंधी हैं।

अपनों से ही युद्ध हो रहा है। पराया तो यहां कोई है ही नहीं।…पराए होते, कठिनाई न थी; दुश्मन होते, कठिनाई न थी।…कृष्ण का प्रयोजन क्या है? वे क्यों समझा रहे हैं कि तू रुक; भाग मत! क्योंकि जो भाग गया स्थिति से, वह कभी भी स्थिति के ऊपर नहीं उठ पाता। जो परिस्थिति से पीठ कर गया, वह हार गया। भगोड़ा यानी हारा हुआ। जीवन ने एक अवसर दिया है पार होने का, अतिक्रमण करने का। अगर तुम भाग गए, तो तुम अवसर खो दोगे।

भागो मत, जागो। भागो मत, रुको। ज्यादा जागरूक, ज्यादा सचेतन बनो; ज्यादा जीवंत बनो; ज्यादा ऊर्जावान बनो; ज्यादा विवेक, ज्यादा भीतर की मेधा उठे। तुम्हारी मेधा इतनी हो जाए कि समस्याएं नीचे छूट जाएं।"—ओशो

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