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एस धम्मो सनंतनो—भाग सात – Es Dhammo Sanantano, Vol. 07

New एस धम्मो सनंतनो—भाग सात – Es Dhammo Sanantano, Vol. 07
Views: 234 Brand: Osho Media International
Product Code: Hardbound - 326 pages
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धम्मपद: बुद्ध-वाणी

ध्यान आंख है
बुद्ध के साथ धर्म ने वैज्ञानिक होने की क्षमता जुटाई। बुद्ध के साथ धर्म वैज्ञानिक हुआ। बुद्ध के साथ विज्ञान की गरिमा धर्म को मिली। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि आज विज्ञान के युग में जब राम फीके पड़ गए हैं और क्राइस्ट के पीछे चलने वाले भी औपचारिक ही क्राइस्ट का नाम लेते हैं, महावीर की पूजा भी चलती है, लेकिन बस नाममात्र को, कामचलाऊ, बुद्ध की गरिमा बढ़ती जाती है। जैसे-जैसे विज्ञान प्रतिष्ठित हुआ है मनुष्य की आंखों में, वैसे-वैसे बुद्ध की गरिमा बढ़ती गई है। बुद्ध की गरिमा एक क्षण को भी घटी नहीं है। और तो सत्पुरुष पुराने पड़ गए मालूम पड़ते हैं, बुद्ध ऐसा लगता है कि अब उनका युग आया। या शायद अभी भी नहीं आया है, आने वाला है। पगध्वनि सुनाई पड़ती है कि बुद्ध का युग करीब आ रहा है। ओशो

Chapter Titles

61: ध्यान आंख है
62: संसार: सीढ़ी परमात्मा तक जाने की
63: सारे अस्तित्व का चौराहा: मनुष्य
64: अहंकार की हर जीत हार है
65: अमृत से परिचय: मौत के क्षण निस्तरंग चित्त पर
66: शून्य है आवास पूर्ण का
67: अंतस्‌-केंद्र पर अमृत है
68: परम दिशा तुम्हारे भीतर की ओर
69: मृत्यु तो एक झूठ है
70: विपन्नता का कारण: हमारी मान्यताएं

उद्धरण: एस धम्मो सनंतनो—भाग सात 

अहंकार की हर जीत हार है
समर्पण अनिवार्य है। फिर चाहे मार्ग भक्ति का हो, चाहे ध्यान का। फर्क इतना ही पड़ेगा कि भक्ति के मार्ग पर समर्पण पहले है, पहले चरण में, और ध्यान के मार्ग पर समर्पण है अंतिम चरण में।

भक्ति कहती है, अहंकार को छोड़ कर ही मंदिर में प्रवेश करो। क्योंकि जिसे छोड़ना ही है, उसे इतने दूर भी क्यों साथ ढोना? छोड़ ही दो। भक्ति पहले ही क्षण में अहंकार को गिरा देती है। भक्ति को सुविधा है, क्योंकि भगवान की धारणा है।

ध्यानी को वैसी सुविधा नहीं है। ध्यानी चलता है बिना किसी धारणा के। तो अहंकार बचा रहेगा। किसके चरणों में रखें अहंकार को? ध्यानी तो अनुभव के बाद ही, गहरे अनुभव में उतर कर ही, आखिरी घड़ी में, जब कुछ और शेष न रह जाएगा, सिर्फ सूक्ष्म अहंकार मात्र शेष रह जाएगा, वही पर्दा रहेगा। बहुत झीना पर्दा, इतना झीना, इतना पारदर्शी कि बहुतों को तो लगेगा कि यह पर्दा है ही नहीं। जैसे शुद्ध कांच। जब तक तुम पास ही न आ जाओगे, तुम्हें लगेगा कोई पर्दा है ही नहीं बीच में। सब साफ दिखाई पड़ रहा है। लेकिन जब तुम पास आओगे, तब टकराओगे। उस घड़ी में अहंकार को छोड़ना पड़ता है। अंतिम घड़ी में।

तो ध्यान-मार्ग भी अंततः कैसे तुम अहंकार को छोड़ोगे उसके लिए व्यवस्था जुटाता है। जुटानी ही पड़ेगी। यह बुद्ध की व्यवस्था है कि उन्होंने त्रि-शरण कहे। बुद्ध इन्हें त्रि-रत्न कहते हैं। हैं भी ये रत्न। इनसे बहुमूल्य और कुछ भी नहीं, क्योंकि इन्हीं को खोकर हमने सब खोया है। और इन्हीं को पाकर हम सब पा लेंगे। ये हैं तीन रत्न--बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि! और इनके पीछे एक तर्कसरणी है।

समझो। पहले तो बुद्ध के प्रति। बुद्ध का अर्थ गौतम बुद्ध नहीं है। इस भ्रांति में मत पड़ना। बुद्ध का अर्थ है, बुद्धत्व।

एक बार बुद्ध से किसी ने पूछा कि आप तो कहते हैं कि किसी की शरण में जाने की जरूरत नहीं है और लोग आपके सामने ही आकर कहते हैं--बुद्धं शरणं गच्छामि? आप चुप रहते हैं। चुप्पी से तो समर्थन मिलता है। यह तो मौन समर्थन हो गया। आपको इनकार करना चाहिए। तो गौतम बुद्ध ने कहा, वे मेरी शरण जाते हों तो मैं इनकार करूं, और मेरी शरण तो जाएंगे भी कैसे? क्योंकि मैं तो बचा भी नहीं। वे बुद्धत्व की शरण जाते हैं। जो बुद्ध हुए हैं अतीत में, जो बुद्ध आज हैं, और जो बुद्ध कभी होंगे, उन सभी के सारभूत तत्व का नाम बुद्धत्व है। जो कभी जागे और कभी जागेंगे और जाग रहे हैं, उस जागरण का नाम बुद्धत्व है।

तो पूछने वाले ने पूछा, फिर आपके ही चरणों में आकर क्यों कहते हैं? कहीं भी कह दें। तो उन्होंने कहा, वह उनसे पूछो, वह उनकी समस्या है। उन्हें सब जगह दिखाई नहीं पड़ता, उन्हें मुझमें दिखाई पड़ता है। चलो, यहीं से शुरुआत सही, कहीं से तो शुरुआत हो! झुकना कहीं तो सीखें। आज मुझमें दिखा है, कल और में भी दिखेगा, परसों और में भी दिखेगा, फिर उनकी दृष्टि बड़ी होती जाएगी। एक दफा दिख जाए हीरा, तो फिर तुम्हें बहुत जगह दिखाई पड़ेगा। और एक बार हीरे की ठीक-ठीक परख आ जाए, तो फिर जौहरी की दुकान पर जो साफ-सुथरे, निखरे हीरे रखे हैं, उनमें ही नहीं, खदानों में भी जो हीरे पड़े हैं, जो अभी साफ-सुथरे नहीं हैं, उनमें भी हीरा दिखाई पड़ जाएगा। परख आ जाए।
ओशो

इस पुस्तक में ओशो निम्नलिखित विषयों पर बोले हैं:
ध्यान, प्रेम, समर्पण, संसार, अहंकार, शून्य, मृत्यु, विज्ञान, संकल्प, डायोजनीज
 

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