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एस धम्मो सनंतनो—भाग दस – Es Dhammo Sanantano, Vol. 10

New एस धम्मो सनंतनो—भाग दस – Es Dhammo Sanantano, Vol. 10
Views: 37 Brand: Osho Media International
Product Code: HardBound - 340 pages
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धम्मपद: बुद्ध-वाणी

 
लोभ संसार है, गुरु से दूरी है
जिसके मन में आज भी बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा है, उसके लिए बुद्ध आज उतने ही प्रत्यक्ष हैं जैसे तब थे। कोई फर्क नहीं पड़ा है। श्रद्धा की आंख हो तो समय और स्थान की सारी दूरियां गिर जाती हैं। आज हमसे बुद्ध की दूरी पच्चीस सौ साल की हो गई, यह समय की दूरी है। लेकिन प्रेम के लिए और ध्यान के लिए न कोई स्थान की दूरी है, न कोई समय की दूरी है। ध्यान और प्रेम की दशा में समय और स्थान दोनों तिरोहित हो जाते हैं। तब हम जीते हैं शाश्वत में, तब हम जीते हैं अनंत में। तब हम जीते हैं उसमें, जो कभी नहीं बदलता; जो सदा है, सदा था, सदा रहेगा। एस धम्मो सनंतनो! उसको जान लेना ही शाश्वत सनातन धर्म को जान लेना है। ओशो
 
Chapter Titles
 
    #92: मृत्यु की महामारी में खड़ा जीवन
    #93: जीने में जीवन है
    #94: धर्म के त्रिरल
    #95: मातरम् पितरम् हंत्वा
    #96: लोभ संसार है, गुरु से दूरी है
    #97: मृत्युबोध के बाद ही महोत्सव संभव
    #98: सत्यमेव जयते
    #99: एकमात्र साधना—सहजता
    #100: ध्यान का दीप, करुणा का प्रकाश
    #101: हम अनंत के यात्री हैं

    #102: जीवन का परम सत्य: यहीं, अभी, इसी में

 

  • उद्धरण: एस धम्मो सनंतनो—भाग दस
  • जीवन का परम सत्य: यहीं, अभी, इसी में

    जीवन में जो छोटी-छोटी बातों में विराट के दर्शन पा ले, वही बुद्धिमान है। जो अणु में असीम की झलक पा ले, वही बुद्धिमान है। क्षुद्र में जिसे क्षुद्रता न दिखाई पड़े, क्षुद्र में भी उसे देख ले जो सर्वात्मा है, वही बुद्धिमान है।

    जीवन के सत्य कहीं दूर आकाश में नहीं छिपे हैं। जीवन के सत्य यहीं लिखे पड़े हैं चारों तरफ। पत्ते-पत्ते पर और कण-कण पर जीवन का वेद लिखा है। देखने वाली आंख हों तो वेदों में पढ़ने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि महावेद तुम्हारे चारों तरफ उपस्थित हुआ है। तुम्हारे ही जीवन की घटनाओं में सत्य ने हजार-हजार रंग-रूप लिए हैं। किसी अवतार के जीवन में जाने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे भीतर भी परमात्मा अवतरित हुआ है।

    अगर तुम ठीक से देखना शुरू करो--जिसे बुद्ध सम्यक-दृष्टि कहते हैं, ठीक-ठीक देखना--तो ऐसे बूंद-बूंद इकट्ठे करते-करते तुम्हारे भीतर भी अमृत का सागर इकट्ठा हो जाएगा। और बूंद-बूंद ही सागर भरता है। बूंद को इनकार मत करना, नहीं तो सागर कभी नहीं भरेगा। यह सोच कर बूंद को इनकार मत कर देना कि बूंद में क्या रखा है! हम सागर चाहते हैं, बूंद में क्या रखा है! जिसने बूंद को अस्वीकारा, वह सागर से भी वंचित रह जाएगा, क्योंकि सागर बनता बूंद से है।

    जीवन के छोटे-छोटे फूलों को इकट्ठा करना ही काफी नहीं है, इन्हें बोध के धागे में पिरोओ कि इनकी माला बने। कुछ लोग इकट्ठा भी कर लेते हैं जीवन के अनुभव को, लेकिन उस अनुभव से कुछ सीख नहीं लेते। तो ढेर लग जाता है फूलों का, लेकिन माला नहीं बनती। जब तुम्हारे जीवन के बहुत से अनुभवों को तुम एक ही धागे में पिरो देते हो, जब तुम्हारे जीवन के बहुत से अनुभव एक ही दिशा में इंगित करने लगते हैं, तब तुम्हारे जीवन में सूत्र उपलब्ध होता है।

    इसलिए अगर हम बुद्ध-वचनों को सूत्र कहते हैं, तो उसका कारण है। यह अनेक अनुभवों के भीतर छिपा हुआ धागा है। यह एकाध अनुभव से निचोड़ा नहीं गया है। यह बहुत अनुभवों के फूलों को भीतर अपने में सम्हाले हुए है।

    और खयाल करना, जब माला बनती है तो फूल दिखाई पड़ते हैं, धागा नहीं दिखाई पड़ता। जो नहीं दिखाई पड़ता वही सम्हाले हुए है। वह जो अदृश्य है, उसको पकड़ लेने के कारण इन गाथाओं को सूत्र कहते हैं।

    फिर माला बना लेने से भी बहुत कुछ नहीं होता। दुनिया में तीन तरह के लोग हैं। एक तो जो फूलों का ढेर लगाए जाते हैं, जो कभी माला नहीं बनाते। उनके जीवन में भी वही घटता है जो बुद्धों के जीवन में घटा। बूंदें उनके जीवन में आती हैं, लेकिन बूंदों में उनको सागर दिखायी नहीं पड़ता। और एक-एक बूंद आती है, और बूंद के कारण वे इनकार करते चले जाते हैं। इसलिए सागर से कभी मिलन नहीं होता। दूसरे वे हैं, जो हर बूंद का सत्कार करते हैं। हर बूंद को संगृहीत करते हैं। उनको अनुभव के धागे में जोड़ते हैं। उनके जीवन में बुद्धिमत्ता पैदा होती है।

    मगर एक और इससे भी ऊपर बोध है, जो बुद्धिमत्ता से भी पार है, जिसको हम प्रज्ञा कहते हैं। फूलों को इकट्ठा कर लो, ढेर लगाओ, तो भी सड़ जाएंगे। और माला बनाओ, तो भी सड़ जाएंगे। फूल क्षणभंगुर हैं। इनको सम्हालने का यह ढंग नहीं है। इनको बचाने का यह ढंग नहीं है। फूल तो समय में खिलते हैं। इनके भीतर से शाश्वत को खोजना जरूरी है। ताकि इसके पहले कि फूल कुम्हला जाएं, तुम्हारे हाथ में ऐसा इत्र आ जाए जो कभी नहीं कुम्हलाता।

    फूलों को संगृहीत करने से कुछ लाभ नहीं--ढेर लगाने से तो जरा भी लाभ नहीं है, नुकसान ही है, क्योंकि जिनसे आज गंध उठ रही है, उन्हीं से कल दुर्गंध उठने लगेगी। फूल अगर इकट्ठे किए तो सड़ेंगे। यहां हर चीज सड़ती है।

    इसलिए बुद्धिमान आदमी फूल इकट्ठे नहीं करता। इसके पहले कि फूल सड़ जाएं, उनकी माला बनाता है। लेकिन मालाएं भी इकट्ठी नहीं करता, इसके पहले कि मालाएं सड़ जाएं, उनसे इत्र निचोड़ता है। इत्र निचोड़ने का अर्थ होता है, असार-असार को अलग कर दिया, सार-सार को सम्हाल लिया। हजारों फूलों से थोड़ा सा इत्र निकलता है। फिर फूल कुम्हलाते हैं, इत्र कभी नहीं कुम्हलाता। फिर फूल समय के भीतर पैदा हुए, समय के भीतर ही समा जाते हैं, इत्र शाश्वत में समा जाता है। इत्र शाश्वत है। एस धम्मो सनंतनो!

    जीवन के छोटे-छोटे अनुभव के फूल, इनसे जब तुम असार को छांट देते हो और सार को इकट्ठा कर लेते हो, तो तुम्हारे हाथ में धर्म उपलब्ध होता है--शाश्वत धर्म, सनातन धर्म। तुम्हारे हाथ में जीवन का परम नियम आ जाता है।
    ओशो

    इस पुस्तक में ओशो निम्नलिखित विषयों पर बोले हैं:
    जीवन, मृत्यु, श्रद्धा, लोभ, ध्यान, प्रेम, त्याग, अहंकार, पश्चात्ताप, करुणा

 
Chapter Titles
 
    #92: मृत्यु की महामारी में खड़ा जीवन
    #93: जीने में जीवन है
    #94: धर्म के त्रिरल
    #95: मातरम् पितरम् हंत्वा
    #96: लोभ संसार है, गुरु से दूरी है
    #97: मृत्युबोध के बाद ही महोत्सव संभव
    #98: सत्यमेव जयते
    #99: एकमात्र साधना—सहजता
    #100: ध्यान का दीप, करुणा का प्रकाश

    #101: हम अनंत के यात्री हैं

 

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