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एक नया द्वार – Ek Naya Dwar

-10% एक नया द्वार – Ek Naya Dwar
Views: 505 Brand: Rebel Publishing House
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एक नया द्वार – Ek Naya Dwar

निरीक्षण, ऑब्जर्वेशन चाहिए। क्या हो रहा है, उसे देखने के लिए पूरी सजगता होनी चाहिए। पूरे होश, पूरी अटेंशन से जो देखता है...। विज्ञान में ही निरीक्षण जरूरी है, ऐसा नहीं; धर्म में तो और भी ज्यादा जरूरी है। क्योंकि विज्ञान तो पदार्थों की खोज करता है, धर्म तो आत्मा की। विज्ञान में निरीक्षण जरूरी है, लेकिन धर्म में तो निरीक्षण और भी अनिवार्य है। विज्ञान बाहर के पदार्थों का निरीक्षण करता है, धर्म स्वयं के भीतर जो चित्त है उसका। चित्त का निरीक्षण करें। जागें, और जागें, और जागें और देखें चित्त को। देखते-देखते यह क्रांति घटित होती है और चित्त परिवर्तित हो जाता है।- ओशो

ओशो पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:

जीवन का क्या अर्थ है?
सरलता का क्या अर्थ है?
हमारा चित्त इतना जटिल क्यों हो गया है?
चित्त को बदलने के उपाय
कार्य के साथ चित्त की सजगता के उपाय सामग्री

तालिका अनुक्रम

#1: दूसरों के विचार और ज्ञान से मुक्ति

#2: विश्वास और धारणाएं हमारे बंधन

#3: चित्त की सरलता

#4: पक्षपातों से मुक्त मन

#5: सजग चेतना और शांत चित्त

 

उद्धरण: एक नया द्वार - पांचवा प्रवचन - सजग चेतना और शांत चित्त
 

जिन चीजों को हम चित्त से जबरदस्ती हटाना चाहते हैं, वे आमंत्रित हो जाती हैं। यह चित्त का सहज नियम है। और जिस चीज पर हम चित्त को जबरदस्ती लगाना चाहते हैं, वह चित्त से उतर-उतर जाती है। यह दूसरा नियम है। ये दोनों एक ही नियम के, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस चीज पर आप जबरदस्ती लगाना चाहते हैं उस चीज से चित्त भागेगा, और जिस चीज पर आप जबरदस्ती हटाना चाहते हैं उस पर चित्त आएगा। और इस उधेड़बुन में जो पड़ जाता है, इस पागलपन में जो पड़ जाता है वह केवल थक जाता है और नष्ट हो जाता है, और कहीं पहुंचता नहीं। इसलिए मैं किसी चीज पर चित्त को लगाने को नहीं कह रहा हूं और न किसी चीज से चित्त को हटाने को कह रहा हूं। मैं तो यह कह रहा हूं: जो भी करें, जिंदगी जो चारों तरफ है, जो जिंदगी बही जा रही चारों तरफ, उस पूरी जिंदगी के प्रति होश से जागे हुए रहें। न किसी को हटाएं और न किसी को बुलाएं। यहां मैं बोल रहा हूं, साथ में चिड़ियां आवाज कर रही हैं, पंखों की आवाज हो रही है, कोई बच्चा रोएगा, सड़क से कोई गाड़ी निकलेगी, आवाज होगी। ये सारी आवाजें हो रही हैं।

जागरूक रहें सारी आवाजों के प्रति एक साथ, किसी को चुनें नहीं कि मैं इसी आवाज पर मन को लगाऊंगा और उस आवाज को नहीं सुनूंगा। जो हो रहा है जिंदगी में प्रतिक्षण, मोमेंट टु मोमेंट जो हो रहा है, उसके प्रति पूरी तरह होश से भरे रहें। न तो किसी को हटाएं और न किसी को बुलाएं। बाहर के जगत के प्रति भी यही, और मन में भी जो चलता हो, कोई विचार चलते हों, उन विचारों में से भी छांटे न, कि यह अच्छा विचार है इसको मैं रोकूंगा और यह बुरा विचार है इसे मैं हटाऊंगा। जिसने बुरे विचार को हटाया, उसकी जिंदगी मुश्किल में पड़ जाएगी। बुरा विचार उसे लौट-लौट कर आने लगेगा। साधु-संन्यासी और सज्जन इतने परेशान रहते हैं कि जिसका कोई हिसाब नहीं है। बुरे विचारों को जितना हटाते हैं, पाते हैं कि बुरे विचार उतने ही चले आ रहे हैं। रोग की तरह बुरे विचार पकड़ लेते हैं हटाने वाले को। और अच्छे विचार को जितना पकड़ता है, लगता है कि वह खिसक-खिसक जाता है, हाथ से निकल-निकल जाता है, जैसे कोई पानी पर मुट्ठी बांधता हो।

अच्छे और बुरे विचार के बीच कोई चुनाव न करें। बुरे विचार के प्रति भी जागे रहें और अच्छे विचार के प्रति भी जागे रहें। ध्यान रखें जागे हुए होने का कि मैं होश से भरा रहूं भीतर। मेरे चित्त में कोई भी चीज बेहोशी में न निकलने पाए। कोई भी आए, मैं जाग कर उसे देखूं। जैसे कोई घर पर अपने पहरेदार बिठा देता है, वह पहरेदार देखता रहता है कि कौन गया, कौन आया। ऐसे अपने चित्त को पहरेदार बनाएं, एक वाचमैन बनाएं। और जैसे-जैसे चित्त इस पहरेदारी में समर्थ होता जाएगा, आप हैरान हो जाएंगे, न तो अच्छे विचार आएंगे और न बुरे विचार आएंगे। दोनों विदा हो जाएंगे। क्योंकि बुरे विचार इसलिए आते थे कि आप उनको हटाते थे। अच्छे विचार इसलिए नहीं रुकते थे कि उनको आप रोकते थे। लेकिन जब आपने दोनों बातें छोड़ दीं और मन के प्रति कोई भी भाव न रखा अच्छे और बुरे का, सिर्फ साक्षी रह गए, सिर्फ विटनेस रह गए, तो उनके आने और ठहरने का कोई कारण न रह गया। वे अपने आप विदा हो जाएंगे। और तब जो चित्त की स्थिति बनेगी, वही धार्मिक चित्त है, वही जागा हुआ चित्त है। ओशो

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