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दरिया कहै सब्द निरबाना – Dariya Kahe Sabad Nirbana

-10% In Stock दरिया कहै सब्द निरबाना – Dariya Kahe Sabad Nirbana
Views: 405 Brand: Rebel Publishing House
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दरिया कहै सब्द निरबाना – Dariya Kahe Sabad Nirbana

दरिया के शब्द सुनो, जिंदगी की थोड़ी तलाश करो--‘दरिया कहै सब्द निरबाना।’ ये प्यारे सूत्र हैं, इनमें बड़ा माधुर्य है, बड़ी मदिरा है। मगर पीओगे तो ही मस्ती छाएगी। इन्हें ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और सब बातें सुन लेते हो; इन्हें बहुत भाव-विभोर होकर सुनना। आंखें गीली हों तुम्हारी--और आंखें ही नहीं, हृदय भी गीला हो। उसी गीलेपन की राह से, उन्हीं आंसुओं के द्वार से ये दरिया के शब्द तुम्हारी हृदय-वीणा को झंकृत कर सकते हैं। और जब तक यह न हो जाए तब तक एक बात जानते ही रहना कि तुम भटके हुए हो। भूल कर भी यह भ्रांति मत बना लेना--कि मुझे क्या खोजना है! भूल कर भी इस भ्रांति में मत पड़ जाना कि मैं जानता हूं, मुझे और क्या जानना है! ओशो पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: बुद्धिमत्ता और बौद्धिकता में क्या फर्क है ? जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है? नीति और धर्म में क्या भेद है? इस संसार में इतनी हिंसा क्यों है ? इस जगत का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? कवी और ऋषि में क्या भेद है? संन्यास का क्या अर्थ होता है

सामग्री तालिका

अनुक्रम

#1: अबरि के बार सम्हारी

#2: वसंत तो परमात्मा का स्वभाव है

#3: भजन भरोसा एक बल

#4: आज जी भर देख लो तुम चांद को

#5: निर्वाण तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है

#6: मिटो: देखो: जानो

#7: सतगुरु करहु जहाज

#8: जीवन स्वयं अपनी समाधि है

#9: सतगुरु सबद सांच एह मानी

उद्धरण : दरिया कहै सब्द निरबाना - तीसरा प्रवचन : भजन भरोसा एक बल

दरिया कहै सब्द निरबाना!

निर्वाण की सुगंध उनके ही शब्दों में हो सकती है जो समग्ररूपेण मिट गए, जो नहीं हैं। जिन्होंने अपने अहंकार को पोंछ डाला। जिनके भीतर शून्य विराजमान हुआ है। उसी शून्य से संगीत उठता है निर्वाण का। जब तक बोलने वाला है तब तक निर्वाण की गंध नहीं उठेगी। जब बोलने वाला चुप हो गया, तब फिर असली बोल फूटते हैं। जब तक बांसुरी में कुछ भरा है, स्वर प्रकट न होंगे। बांसुरी तो पोली हो, बिलकुल पोली हो तो ही स्वरों की संवाहक हो पाती है।

दरिया बांस की पोली पोंगरी हैं। शब्द निर्वाण के उनसे झर रहे हैं--उनके नहीं हैं, परमात्मा के हैं। क्योंकि निर्वाण का शब्द परमात्मा के अतिरिक्त और कौन बोलेगा? और कोई बोल नहीं सकता है। और जहां से तुम्हें निर्वाण के शब्दों की झनकार मिले, वहां झुक जाना। फिर अपनी अपेक्षाएं छोड़ देना। लोग अपेक्षाएं लिए चलते हैं, इसलिए सदगुरुओं से वंचित रह जाते हैं। तुम्हारी कोई अपेक्षा के अनुकूल सदगुरु नहीं होगा। तुम्हारी अपेक्षाएं तुम्हारे अज्ञान से जन्मी हैं। तुम्हारी अपेक्षाएं तुम्हारे अज्ञान का ही हिस्सा हैं। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपेक्षाओं के अनुकूल गुरु को खोजता है। गुरु तो सदा मौजूद हैं--पृथ्वी कभी भी इतनी अभागी नहीं रही कि गुरु मौजूद न हों--लेकिन हमारी अपेक्षाएं!...

सदगुरु तो फेंकते हैं वचनरूपी बीज, पर तुम कहां लोगे उन्हें? अगर तुमने अपने सिर में लिया तो वह चलता हुआ रास्ता है; वहां इतने विचारों की भीड़ चल रही है, वहां ऐसा ट्रैफिक है कि वहां कोई बीज पनप नहीं सकता। जब तक कि तुम अपने हृदय की गीली भूमि में ही बीजों को न लो, तब तक फसल से वंचित रहोगे। और जिंदगी बड़ी उदास है। और जिंदगी इसीलिए उदास है कि जिन बीजों से तुम्हारी जिंदगी हरी होती, फूल खिलते, गंध बिखरती, उन बीजों को तुमने कभी स्वीकार नहीं किया है। और अगर तुम पूजते भी हो तो तुम मुर्दों को पूजते हो। अगर तुम फूल भी चढ़ाते हो तो पत्थरों के सामने चढ़ाते हो। अगर तुम तीर्थयात्राओं पर भी जाते हो, बाहर की तीर्थयात्राओं पर जाते हो। तीर्थयात्रा तो बस एक है--उसका नाम अंतर्यात्रा है। और सदगुरु तो केवल जीवित हो तो ही सार्थक है।...

पश्चिम नास्तिक हो गया, कारण यही है कि सदगुरु का सेतु पश्चिम में कभी बना नहीं। पूरब अब भी थोड़ा टिमटिमाता-टिमटिमाता आस्तिक है। बुझ जाएगा कब यह दीया, कहा नहीं जा सकता, हवाएं तेज हैं, आंधियां उठी हैं। चीन डूब गया नास्तिकता में, भारत के द्वार पर नास्तिकता आंधियों और बवंडरों की तरह उठ रही है। यह देश भी कभी नास्तिक हो जाएगा। अधिक लोग तो नास्तिक हो ही गए हैं--सिर्फ उनको पता नहीं है। अधिक लोग तो नास्तिक हैं ही--धर्म उनकी औपचारिकता मात्र है। मगर फिर भी एक दीया थोड़ा-थोड़ा टिमटिमा रहा है। यह भी कब बुझ जाएगा, कहा नहीं जा सकता। इसको तेल चाहिए, इसको बाती चाहिए। और यह दीया भी इसलिए टिमटिमा रहा है कि तुम चाहे मानो और तुम चाहे न मानो, कभी कोई कबीर आ जाता, कभी कोई नानक आ जाता, कभी कोई दरिया जा आता, कभी कोई मीरा आ जाती--इसलिए यह दीया थोड़ा टिमटिमा रहा है। तुम मानो, तुम न मानो, तुम गुरुओं का हाथ गहो, न गहो, लेकिन यह देश सौभाग्यशाली है, यहां सदगुरु की किरणें उतरती ही रही हैं। जो थोड़े साहसी हैं, उन किरणों का हाथ पकड़ लेते हैं और चल निकलते हैं महासूर्य की तलाश पर।

परमात्मा को सीधा नहीं पाया जा सकता। सीधा देखने के लिए आंख कहां? अदृश्य को देखने वाली आंख कहां? परमात्मा ऐसा होना चाहिए जो थोड़ा दृश्य भी हो, थोड़ा अदृश्य भी हो। सदगुरु में यह असंभव घटना घटती है। सदगुरु थोड़ा दृश्य है तुम्हारी तरफ और थोड़ा अदृश्य है। सदगुरु के साथ जुड़ो, तो जुड़ोगे पहले दृश्य से। सुनोगे उसके शब्द, प्यारे लगेंगे, जुड़ोगे। फिर जल्दी ही धीरे-धीरे शब्दों के बहाने निःशब्द को तुम्हें देगा। शब्द के बहाने निःशब्द को उतार देगा। पहले तो दृश्य को देख कर जुड़ोगे, मगर जुड़ गए अगर तो अदृश्य से ज्यादा देर टूटे न रहोगे। पहले तो उसके संगीत से जुड़ोगे, फिर जल्दी ही उसके शून्य से भी जुड़ जाओगे। पहले तो उसकी देह के प्रेम में पड़ोगे, फिर जल्दी ही उसकी आत्मा भी तुम्हें आच्छादित कर लेगी।...

दरिया कहै सब्द निरबाना! दरिया की पूरी शिक्षा--और एक दरिया की क्यों, उन सबकी, जिन्होंने जाना है; उन सब दरियाओं की, उन सब महासागरों की, जिन्होंने विराट को पहचाना है, एक ही देशना है कि ऐसे मरो कि फिर जन्म न हो, ऐसे मरो कि फिर महाजीवन हो, क्षणभंगुर के पीछे क्या दौड़ना, जब शाश्वत पाने का तुम्हारा अधिकार है! कंकड़-पत्थर क्या बीनना, जब सारे अस्तित्व की संपदा तुम्हारी है! छोटी सी देह में क्या सीमित होना, जब आकाश से भी तुम बड़े हो! जब ब्रह्म होने का उपाय हो, जब स्वयं भगवत्ता को पाने का उपाय हो, तब क्यों छोटे-छोटे खिलौनों में जीवन गंवाना! निर्वाण को जिसने समझा, उसने सब समझ लिया। निर्वाण सारे जीवन का सार-निचोड़ है। जैसे हजारों-हजारों फूलों से इत्र निचोड़ा जाता है, ऐसे हजारों-हजारों अनुभवियों ने अपनी समाधि का जो निचोड़ है उसे निर्वाण कहा है।...

दरिया कहै सब्द निरबाना! दरिया तो कहेंगे, पर तुम सुनोगे या नहीं, सवाल असली वहां है। सूरज निकले, पर आंख खोलोगे या नहीं, असली सवाल वहां है। वीणा कोई बजाए, लेकिन तुम वज्र-बधिर की तरह बैठे रह सकते हो। तुम्हारे हृदय में कोई झनकार उठेगी या नहीं, असली सवाल वहां है। दरिया तो कहेगा, दरिया कहता रहा है, दरिया आगे भी कहता रहेगा। दरिया आते रहे, दरिया आते रहेंगे। सदगुरु से पहचान हो जाए तो सदगुरु सेतु है। तुम्हारे और तुम्हारे बीच--सदगुरु सेतु है। तुम्हें तुमसे जोड़ देता है। तुम बाहर भी हो और भीतर भी हो, मगर तुम्हारे बाहर और भीतर के बीच तालमेल टूट गया है। उसी तालमेल को बिठा देता है।... एक क्षण भर को सदगुरु से आंखें चार हो जाएं--और क्रांति का महाक्षण आ पहुंचा!
ओशो

 

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